एक समय की बात है, बहुत समय पहले की बात है, एक छोटा सा गांव था। उस गांव में एक बहुत ही साधू और भक्तिमय ग्रामीण रहता था। उसका नाम रामदास था। वह अपने अच्छे व्यवहार, त्याग और सेवा भाव से लोगों के बीच बहुत प्रसिद्ध थे। उन्हें गांव के लोगों का अभिमान था।

एक दिन रामदास ने सोचा कि वह अपने आठवें जन्मदिन पर अपने समस्त समय को भगवान की सेवा में समर्पित करेंगे। उन्होंने गांव के सभी लोगों को आमंत्रित किया कि वे उनके घर आएंगे और भगवान की पूजा अर्चना में भाग लेंगे।

जब उस दिन आया, तो सभी लोग रामदास के घर पहुंच गए। रामदास ने एक बड़े वृक्ष के नीचे एक बड़ी पूजा स्थली स्थापित की। वहां पर भगवान की मूर्ति, फूल, दीपक और प्रशाद रखे गए।

रामदास ने सभी लोगों को अपने घर आमंत्रित किया था, लेकिन किसी ने उनकी आमंत्रण नहीं मानी। वे सभी नगरवासी उनसे इंकार कर रहे थे। रामदास बहुत ही हृदयविदारक हुए, क्योंकि वह अपने जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा था।

भक्ति और सेवा: एक साधू की कथा

परन्तु रामदास ने आशा नहीं छोड़ी और बिना किसी शिकायत के वे पूजा अर्चना को आगे बढ़ाने लगे। वे अपने साथी ग्रामीणों के साथ मन लगाकर भजन की गायन करने लगे। उन्होंने ब्रह्मांड के सृष्टि कर्ता के नाम की महिमा गाई और भक्ति भाव से उनकी पूजा की।

सभी लोग हैरान हो गए और उनके चरणों में गिर गए। रामदास ने सभी को प्रसन्न होकर अपने आशीर्वाद दिए और उन्हें शांति और समृद्धि की कामना की। वे सभी लोग अपने घरों को लौट गए, लेकिन उन्होंने रामदास के प्रेम और आदर्शों को कभी नहीं भूला।

इस कथा से हमें यह सिख मिलती है कि हमें किसी के द्वारा दिये गए सम्मान और महत्व को खोने की जरूरत नहीं होती है। हमें ईश्वर की सेवा में निःस्वार्थ भाव से काम करना चाहिए। जब हम सच्ची भक्ति और प्रेम से कार्य करते हैं, तो ईश्वर हमारी ओर ध्यान देते हैं और हमारे लिए आशीर्वाद लेकर आते हैं।

यह कथा हमें यह भी दिखाती है कि हमें किसी भी परिस्थिति में प्रभु का सम्मान करना चाहिए, चाहे हमारी सेवा को स्वीकार करने वाले लोग हों या न हों। हमें अपने निःस्वार्थी कर्मों में विश्वास रखना चाहिए और ईश्वर की कृपा पर निर्भर रहना चाहिए। इससे हम आत्मिक शांति और प्रगति प्राप्त कर सकते हैं।


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